सोमवार, 26 सितंबर 2011

जनसंस्कृतियाँ और साम्राज्यवादी संस्कृति – तीसरा भाग

जनसंस्कृतियाँ और साम्राज्यवादी संस्कृति – तीसरा भाग
शिवराम
 
( शिवराम का भारतीय समाज के संदर्भों में जनसंस्कृतियों की विकास-अवस्थाओं और साम्राज्यवादी अपसंस्कृतिकरण पर लिखा गया यह महत्त्वपूर्ण आलेख इसकी लंबाई को देखते हुए यहां चार भागों में प्रस्तुत किया जा रहा है. प्रस्तुत है तीसरा भाग. )

देखिए : जनसंस्कृतियाँ और साम्राज्यवादी संस्कृति : पहला भाग, दूसरा भाग

हिन्दी भाषा और हिन्दी जातीयता के प्रभुतावादी व्यवहार का भय फैलाए जाने ने भारत की विभिन्न जातीयताओं के एक संघीय बहुराष्ट्रीय आधुनिक महाजाति के निर्माण में भारी बाधा पहुंचाई है। ‘हिन्दु राष्ट्रवाद’ और ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का उसका चिन्तन साम्राज्यवादी चिन्तनधारा का ही विष बीज है। जो हिन्दु-मुस्लिम धार्मिक अंतर्विरोधों और भारतीय जातीयताओं के बीच अविश्वसनीयता और संदेह को तीव्र कर साम्राज्यवाद की ही मदद करता है। यह भारतीय शासकों के फासीवादी-साम्राज्यवादी भविष्योन्मुखी मंतव्यों की भी अभिव्यक्ति है। राज्यों के साथ भेदभाव और उनके असमान विकास ने इस ऐतिहासिक दायित्व के पूरा होने में दूसरी बड़ी बाधा खड़ी की है। शासक वर्गों द्वारा संघीय गणराज्य के अंतर्गत राज्यों के जनतांत्रिक अधिकारों के दमन ने इस कार्य में तीसरी बड़ी बाधा उत्पन्न की है। क्षेत्रिय राजनैतिक दलों का उदय इन्हीं परिस्थितियों की उपज है। शासक वर्गों की सुकेन्द्रित संघीय राज्य सत्ता निरंतर क्षीण हुई है। इन स्थितियों ने भी साम्राज्यवाद के आर्थिक राजनैतिक षड़यंत्रों और साम्राज्यवादी अपसंस्कृति के प्रसार के लिए उपजाऊ जमीन बनाई है।

हमें साम्राज्यवादी सांस्कृतिक आक्रमण को अलग-अलग जनपदीय संस्कृतियों के बरअक्स अलग-अलग रूपों के साथ संघबद्ध बहुराष्ट्रीय महाजातीयता के बरअक्स भी देखना चाहिए और साथ में यह भी देखना चाहिए कि राष्ट्रीय संघबद्ध महाजातीयताओं के अंतर्विरोधों का साम्राज्यवादी संस्कृति कैसे अपने हित में उपयोग करती हैं और उसकी अलग-अलग राष्ट्रीय जातीयताओं और जनपदों की संस्कृति के बरअक्स क्या व्यवहार करती है। विखंडनवादी नजरिया भी तो साम्राज्यवादी संस्कृति का ही एक नजरिया है, जिसका वह उपयोग कर रही है।

हमें देखना चाहिए कि हमारे छोटे-छोटे जनपद अलग-अलग रूप से साम्राज्यवादी संस्कृति के आक्रमण का मुकाबला नहीं कर सकते। यदि साम्राज्यवादी सांस्कृतिक आक्रमण का मुकाबला करना है तो हमें हमारी बहुराष्ट्रीय संघबद्ध महाजातीयता को एकताबद्ध करना होगा। हिन्दी भाषी जातीयता को भी जनपदों और राज्यों की भौगोलिक सीमा से ऊपर उठकर एकताबद्ध होना होगा। हिन्दी जातीयता को प्रभुतावादी सामंती मानसिकता से बाहर निकालना होगा। हिन्दी जातीयता को अन्य भारतीय जातीयताओं में जनतांत्रिक व्यवहार का विश्वास जगाना होगा। यह वास्तविकता है कि वह भारत की बहुराष्ट्रीय संघबद्ध महाजाति की सबसे बड़ी जातीयता है और अतीत में तथा वर्तमान में भी उसने ही साम्राज्यवादी राजनैतिक-सांस्कृतिक आक्रमणों को सर्वाधिक झेला है। भविष्य में भी उसे ही झेलने होंगे। हिन्दी भाषी जातीयता का यह ऐतिहासिक दायित्व है कि वह साम्राज्यवादी उपनिवेशीकरण के इस दौर के आक्रमण के विरूद्ध जिम्मेदार भूमिका निभाए।

यह उसी का दायित्व था और आज भी यह उसी का दायित्व है कि वह भारत की समस्त जातीयताओं की वृहद बहुराष्ट्रीय संघबद्ध महाजाति के निर्माण प्रक्रिया को आगे बढ़ाए और पूरा करे। यह प्रभुत्ववादी दृष्टिकोण और आचरण से नहीं जनतांत्रिक संघवादी आचरण से ही सम्भव है। इसलिए विभिन्न हिन्दी भाषी प्रदेशों और जनपदों के बीच यह दायित्व बोध जागृत होना चाहिए। यही दायित्व बोध उन्हें एकता के रास्ते पर ले जाएगा। धर्म और भाषा की साम्प्रदायिकता को केन्द्र में लाया जाना मतभेदों को तीव्र करना है।

व्यवहार में जन साधारण के बीच, श्रमजीवी समाज के बीच, व्यवसायियों-व्यापारियों के बीच हिन्दी का प्रयोग निरंतर व्यापक हो रहा है। वह विभिन्न जातीयताओं के बीच सम्पर्क भाषा के रूप में किसी भी अन्य भारतीय भाषा की तुलना में अधिक स्वीकार्य हुई है। हिन्दी जातीयता की प्रभुत्ववादी आशंकाओं के कारण अन्य भारतीय जातीयताएं राज-काज और सम्पर्क भाषा के रूप में अंग्रेजी का पक्ष ग्रहण करती हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि अंग्रेजी विभिन्न भारतीय जातीयताओं के अभिजन समाज की ही सम्पर्क भाषा है। ज्यादा से ज्यादा थोड़ा बहुत मध्य वर्ग के ऊपरी संस्तरों तक उसका प्रसार माना जा सकता है। अंग्रेजी की इस स्थिति ने भारत में एक मार्शल समाज का निर्माण जरूर कर दिया है जिसके लिए राज-काज के प्रमुख पद आरक्षित हैं।

साम्राज्यवादी संस्कृति के वर्तमान दौर के लिए भारत की यह भाषाई स्थिति बहुत लाभदायक सिद्ध हो रही है। उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होने के कारण और अत्यधिक महंगी होने के कारण वह उच्च मध्य वर्ग और अभिजन समाज के लिए आरिक्षत हो गई है। इस स्थिति ने भारतीय समाज में एक अलग तरह का भाषाई और सांस्कृतिक विभाजन उपस्थित कर दिया है जिसका वर्गीय स्वरूप भी है।

साम्राज्यवाद का आर्थिक आक्रमण मुख्य रूप से अभी श्रमजीवी जनगण के विरूद्ध केन्द्रित है। मजदूर और किसान तथा उनकी युवा पीढ़ी इस आक्रमण से तबाह हो रहे हैं। जबकि मध्य वर्ग के ऊपरी संस्तर और अभिजन समाज, साम्राज्यवादी लूट का एक हिस्सा प्राप्त करके खुशहाल हो रहा है। यही नव औपनिवेशिक विकास है। यही ‘भारत के महाशक्ति बनने’ का अनोखा भ्रम है।

साम्राज्यवादी संस्कृति अपने रंगरूट इसी वर्ग से भर्ती करती है। साम्राज्यवाद द्वारा संचालित एन.जी.ओ.’ज इन्हीं रंगरूटों के माध्यम से मध्य वर्ग और निम्न मध्य वर्ग के आदर्शवादी मानवीय मन वाले प्रतिभाशाली बेरोजगार युवक-युवतियों को अपनी सेवा में लगा रहे हैं। उनकी श्रमजीवी जनगण के पक्ष में वास्तविक सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता बनने की स्वाभाविक प्रक्रिया को भंग करके उन्हें आभासी कार्यकर्ता बना कर छोड़ देते हैं। नव धनाढ्य उच्च और मध्य वर्ग उसकी भोगवादी उपभोक्ता संस्कृति और बाजारवादी संस्कृति का वाहक है।

एन.जी.ओ.’ज केन्द्रीय मुद्दों पर छिड़ने वाले वर्ग संघर्षों को हाशिए पर डालने और अन्य मुद्दों को केन्द्र में लाने की भूमिका अदा करते हैं जैसे साक्षरता, पर्यावरण, स्वास्थ्य आदि। वे शिक्षा, साम्प्रदायिक सद्भाव, आदिवासी विस्थापन, बाल श्रम और असंगठित श्रमिकों के लिए भी काम करते दिखाई देते हैं। यह भी आभासी संघर्ष, आभासी अभियान होते हैं। जिनका ‘डॉक्यूमेन्टेशन’ बड़ा प्रभावशाली होता है लेकिन जिनके काम और प्रभाव डॉक्यूमेन्टेशन लायक भी महत्वपूर्ण नहीं होते। वास्तविकता का आभासी से विस्थापन भी साम्राज्यवादी सांस्कृतिक आक्रमण का एक हथियार है। गौर से देखा जाए तो उनका यह मानवीय व्यवहार उपभोक्तावादी समाज के विस्तार का ही साम्राज्यवादी उपक्रम है।

वे जन-आंदोलनों के गैर-राजनीतिक रहने का दर्शन गढ़ते हैं और जनांदोलनों के क्रांतिकारी राजनीति से अलगाव हेतु सायास प्रयत्न करते हैं। वे संसदीय राजनीति से मोह भंग को एक ऐसे राजनीतिक शून्य में बदलने की कोशिश करते हैं जिसका कोई क्रांतिकारी विकल्प सम्भव नहीं दिखाई दे। क्रांतिकारी विचारधारा को सुधारवादी विचारधारा के विभ्रमों से युक्त करना और क्रांतिकारी शक्तियों को सुधारवादी सक्रियता में लिप्त कर देना भी साम्राज्यवादी संस्कृति की रणनीति है, जिसे वह अनेक विचारधारात्मक विमर्शों के जरिये अंजाम दे रही है। नव मार्क्सवाद, उत्तर आधुनिकतावाद, विखंडनवाद आदि उसके ऐसे ही विमर्श हैं। भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन की क्रांतिकारी धार का लगातार भोंथरे होते जाना और उसमें संसदीय वामपंथी-सामाजिक जनवादी प्रवृत्तियों का विस्तार, जो स्वयं को विद्यमान साम्राज्यवादपरस्त पूंजीवादी व्यवस्था का बेहतर प्रबंधक सिद्ध करने को लालायित दिखाई देते हैं, इस तथ्य का द्योतक है कि साम्राज्यवादी रणनीति किस तरह प्रभावी हो रही है।

जिस प्रकार विमर्शवाद निष्कर्षविहीन अनन्त विमर्श की संस्कृति पैदा करता है और मुक्ति संघर्षों के चिंतन को विस्थापित करता है। वैसे ही एन.जी.ओ. संस्कृति क्रांतिकारी चेतना से पूर्णतया मुक्त गैर राजनैतिक यथास्थितिवादी-सुधारवादी-आभासी जनआंदोलनों की संस्कृति पैदा करती है। दलित मुक्ति, नारी मुक्ति, आदिवासी मुक्ति के संघर्षों को नपुंसक विमर्शों में बदला जा रहा है, वर्गीय विमर्शों को विस्थापित किया जा रहा है और हमारी अनेक प्रगतिशील, जनवादी पत्रिकाएं भी इसमें लिप्त हो गई हैं।

साम्राज्यवादी संस्कृति के आक्रमण की रणनीति को समझने के लिए कार्ल मार्क्स और नोम चोमस्की के निम्नांकित दो उद्धरण गौरतलब है - ‘‘पूंजीवादी सभ्यता की आंतरिक बर्बरता और उसकी गहरी धूर्तता हमारी आंखों के सामने खुली पड़ी है। अपने घर में वह अच्छे रूप धारण कर लेती है, उपनिवेशों में वह नंगी होकर घूमती है।’’ - कार्ल मार्क्स। यह मार्क्स ने भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 पर अपनी प्रतिक्रिया ‘दी फर्स्ट इण्डियन वार ऑफ इन्डिपिन्डेंस’ में कहा था। आज का साम्राज्यवाद तो तब के साम्राज्यवाद से कहीं अधिक कुटिल और क्रूर है। ‘‘अमेरिका अपना साम्राज्य उसी ढंग से फैलाना चाहता है जिस ढंग से कभी उसने अमेरिका को बसाते समय अमेरिका के लाखों मूल निवासियों को मौत की नींद में सुला दिया था।’’ - नोम चोमस्की। नोम चोमस्की का यह बयान वर्तमान साम्राज्यवाद की बर्बरता को लक्षित करता है।

लेकिन उस दौर के साम्राज्यवाद और वर्तमान साम्राज्यवाद की अंतर्वस्तु में पूंजीवादी होते हुए भी काफी भिन्नताएं है। पहले वह दुनिया का बंटवारा करने के लिए संघर्षरत-युद्धरत हुआ था अब वह एकध्रुवीय होकर सारी दुनिया को अपनी मुट्ठी में करने को संघर्षरत-यु्द्धरत है। पहले वह राजनैतिक वर्चस्व स्थापित करता आता था। उपनिवेशों की जनता को साफ दिखाई देता था कि किसी ने उन्हें गुलाम बना लिया है। अब वह पहले आर्थिक आधिपत्य जमाता है, साथ में सांस्कृतिक वर्चस्व का अभियान छेड़ता है, परोक्ष राजनैतिक आधिपत्य बाद में जमाता है। अब उसके पास सूचना तंत्र का सांस्कृतिक महाआयुध है जो पहले नहीं था। पहले भी वह वित्तीय पूंजी का ध्वजाधारी था अब भी वह वित्तीय पूंजी का ध्वजाधारी है, लेकिन वित्तीय पूंजी का चरित्र अब पहले से काफी बदल गया है। अब वह अनुत्पादक सटोरिया जुआरी वित्तीय पूंजी अधिक है, उत्पादक कम। वह प्राकृतिक संसाधन, मानव संसाधन और बाजार, तीनों का दोहन पहले भी करती थी, अब भी करती है। परन्तु अब वह बहुत अधिक तीव्र है।

अब वह मरणासन्न अवस्था के अंतिम चरण में है उसके पास मानव सभ्यता को देने के लिए बर्बरता, तबाही और युद्ध के सिवाय कुछ भी नहीं बचा है। वह अब तक जन्मे सभी निकृष्ट और पतित मूल्यों-आचरणों का वाहक बन गया है। प्रगतिशलीलता के नाम पर अब उसके पास कुछ भी शेष नहीं है। पहले वह ‘फासीवाद’ की विचारधारा के साथ आया था, अब भी वह फासीवाद के सारतत्व को अमली जामा पहना रहा है, लेकिन और अधिक क्रूरता और बर्बरता के साथ। नस्लों को कुचलता, राष्ट्रीय राज्यों की सम्प्रभुता को नेस्तनाबूत करता और उन्हें गुलाम बनाता, मजदूर वर्ग को अधिकार विहीन गुलाम बनाता, विभिन्न सभ्यताओं के बीच संघर्ष फैलाता। उसने दुनिया को आतंकवाद का तोहफा दिया है। जो उसके विरूद्ध लड़ता हुआ दिखता है लेकिन जो उसके लक्ष्यों में उसका मददगार साबित होता है।

सामंती साम्राज्यवादी संस्कृति भी अन्य संस्कृतियों के साथ वर्चस्ववादी व्यवहार करती थी लेकिन पूंजीवादी साम्राज्यवादी संस्कृति का व्यवहार अधिक आक्रामक, विघटनकारी और विनाशकारी है। सामंती साम्राज्यवाद का लक्ष्य जनपदीय संस्कृतियों को लघु जातीय संस्कृति और लघु जातीय संस्कृतियों को राष्ट्रीय जातीय संस्कृतियों में विकसित करना था। इसलिए वह अन्य संस्कृतियों को नष्ट नहीं करता था बल्कि उनके श्रेष्ठ को संजोता था और कुल मिलाकर एक बड़ी-व्यापक उच्च स्तरीय संस्कृति का निर्माण करता था। पूंजीवादी साम्राज्यवाद उच्च स्तरीय वैश्विक संस्कृति के निर्माण के लिए बिल्कुल प्रस्तुत नहीं होता। वह अपनी भोगवादी पतनशील संस्कृति का वर्चस्व स्थापित करने और अन्य राष्ट्रीय जातीयताओं की संस्कृति के विखण्डन और विनाश के लिए उद्धत होता है। संस्कृति को मुनाफे के लिए व्यापार की एक वस्तु बना देता है। साम्राज्यवादी संस्कृति, दुनिया की सांस्कृतिक विविधता को नष्ट कर देने को उद्धत है। वह उसे वि्कृत और विस्थापित करने को उद्धत है।

( अगली बार – लगातार – अंतिम भाग )
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आलेख – शिवराम

जनसंस्कृतियाँ और साम्राज्यवादी संस्कृति – दूसरा भाग

जनसंस्कृतियाँ और साम्राज्यवादी संस्कृति – दूसरा भाग
शिवराम
 
( शिवराम का भारतीय समाज के संदर्भों में जनसंस्कृतियों की विकास-अवस्थाओं और साम्राज्यवादी अपसंस्कृतिकरण पर लिखा गया यह महत्त्वपूर्ण आलेख इसकी लंबाई को देखते हुए यहां चार भागों में प्रस्तुत किया जा रहा है. प्रस्तुत है दूसरा भाग. )
 
देखिए : जनसंस्कृतियाँ और साम्राज्यवादी संस्कृति : पहला भाग

अब जब दुनिया अमेरिकन साम्राज्यवाद के आर्थिक-राजनैतिक और सांस्कृतिक हमले की चपेट में है और भारत भी इस हमले का शिकार है, हमें समझना चाहिए कि भारत एकताबद्ध राष्ट्र राज्य के रूप में ही पूंजीवादी साम्राज्यवाद के वर्तमान हमले का मुकाबला कर सकता है। शासक वर्ग इस एकता के प्रति बेहद लापरवाह है। भाषावार राज्यों का गठन हुआ और राष्ट्रीय राज्य में गणसंघीय स्वरूप को संवैधानिक मान्यता भी दी गई लेकिन विभिन्न जातीयताओं और भाषाओं के साथ भेदभाव रहित न्याय नहीं किया गया। शासक वर्ग अपने राजनैतिक नियंत्रण और आर्थिक लाभ के अनुरूप भेदभावपूर्ण नीतियां अपनाता रहा।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर साम्प्रदायिक फासीवाद ने धार्मिक आधार पर सामाजिक अलगाव को चिन्ताजनक स्थिति में पहुंचा दिया है। राज्य सरकारों को विदेशी साम्राज्यवादी सरकारों और साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से सीधे समझौते करने और अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवादी वित्तीय संस्थाओं से सीधे ऋण लेने की छूट सुकेन्द्रित राष्ट्र राज्य को कमजोर ही नहीं करता, साम्राज्यवाद को हमारे जातीय अंतविरोधों को बढ़ाने का अवसर भी प्रदान करता है। भारतीय शासक पूंजीपति वर्ग, साम्राज्यवाद के साथ गठजोड़ बनाए हुए है और वह उसे आगे बढ़ा रहा है। विभिन्न जातीयताओं के साथ भेदभाव और उनकी सांस्कृतिक पहचान तथा विकास की चिन्ताओं को गम्भीरता से नहीं लिया जा रहा है। विभिन्न राज्यों के असमान विकास की स्थितियां भी विभिन्न जातीयताओं के बीच वैमनस्यपूर्ण अंतर्विरोधों को बढ़ा रहे हैं। ये स्थितियां हमें साम्राज्यवादी सांस्कृतिक आक्रमण के समक्ष कमजोर स्थिति में खड़े किए हुए हैं।

जनपदीय संस्कृतियां, जातीय संस्कृतियां और जनजाति संस्कृतियां और समग्र रूप में देश की बहुराष्ट्रीय जातीय संस्कृति, सभी साम्राज्यवादी सांस्कृतिक आक्रमण से क्षतिग्रस्त हो रही हैं, वे विकृत की जा रही हैं। उनका अपसंस्कृतिकरण किया जा रहा है। भाषाई साम्राज्यवाद फैल रहा है। लेकिन साम्राज्यवादी सांस्कृतिक हमले के विरूद्ध, बहुराष्ट्रीय भारत की विभिन्न राष्ट्रीय जातीयताएं, जनपद और जनजातियां एकताबद्ध प्रतिरोध, प्रतिकार, संगठित नहीं कर पा रही हैं। वे साम्राज्यवादी सांस्कृतिक आक्रमण के बरअक्स अपनी सांस्कृतिक नीति सुनिश्चित नहीं कर पा रही हैं। आर्थिक राजनैतिक क्षेत्र में भी साम्राज्यवादी घुसपैठ और आक्रमण का स्थानीय प्रतिरोध और प्रतिकार तो प्रत्यक्ष होता हैं लेकिन वे व्यापक रूप धारण नहीं कर पाते भारतीय बहुराष्ट्रीय राज्य की केन्द्रीय और राज्य सरकारें इन प्रतिरोधों-प्रतिकारों में साम्राज्यवाद विरोधी जन पक्षधर भूमिका निभाने के बजाय प्रतिरोधी जनता का दमन करती दिखाई देती है। हिन्दू उग्रवादी मानसिकता पश्चिमी संस्कृति का जिस तरह का विरोध संगठित करती है वह अपने मूल चरित्र में गैर-जनतांत्रिक एवं फासीवादी होता है। वे साम्राज्यवादी अपसंस्कृति से नहीं लड़ रहे होते हैं, बल्कि हिन्दुत्ववादी सामंती संस्कृति की रक्षा हेतु सामंती लठैतों की तरह व्यवहार कर रहे होते हैं।

भारतीय समाज की सामाजिक संरचना मुख्यतया सामंती है। वह जनतांत्रिक आधुनिक समाज में विकसित नहीं हो सका। जिसे आधुनिक समाज कहा जाता है वह पश्चिमी संस्कृति की नकल जरूर करता है। रहन-सहन के आधुनिक ढंग तो उसने सीख लिए हैं, ऊपरी आचरण की सभ्यता भी सीख ली है, लेकिन उसकी चित्तवृत्ति सामंती ही बनी हुई है। औरों की तो बात छोडि़ए हमारे साम्यवादी भी सामंती अहं, व्यक्तिवाद और प्रभुतावादी प्रवृत्तियों से मुक्त नहीं हो पाए हैं। विचारों से साम्यवादी और व्यवहार में सामंती प्रवृत्ति साम्यवादी आंदोलन की एक बड़ी समस्या के रूप में आज भी बनी हुई है। गैर साम्यवादियों की तो बात ही छोडि़ए। विकसित पूंजीवादी देशों में जो आधुनिक संस्कृति अस्तित्व में आयी वह उनके शासकों के साम्राज्यवादी व्यवहार ने विकृत कर  दी हैं, भोगवादी, उपभोक्तावादी, वर्चस्ववादी और कुंठित।

जनपदीय संस्कृति, सामंती संस्कृति ही होती है। सवाल उनकी सामंती संस्कृति को बचाने का नहीं है, उनकी संस्कृति के श्रेष्ठ की रक्षा करते हुए उसे आधुनिक जनतांत्रिक संस्कृति में विकसित करने का है। आधुनिकता का अभिप्राय पश्चिम की नकल नहीं होता, तर्कसंगत वैज्ञानिक दृष्टिकोण होता है। रूढि़यों-अंधविश्वासों-निरर्थक धार्मिक कर्मकाण्डों से मुक्ति होता है। समानता-स्वतंत्रता और भाई-चारे के मूल्यों से युक्त जीवन दर्शन को ग्रहण करना होता है। लिंग भेद, वर्ण भेद, जाति भेद, क्षेत्रियता भेद और वर्ग भेद विरोधी समानता की पक्षधर चेतना होता है। जनतांत्रिक व्यवहार होता है। ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान होता है।

ब्रिटिश साम्राज्वाद के दौर में हम पश्चिम के आधुनिक चिन्तन के सम्पर्क में तो आए, विभिन्न प्रकार के सामाजिक सुधारवादी आंदोलन भी हुए। लेकिन भारतीय समाज का सामंती ढांचे में और खासकर सामंती संस्कृति में अत्यल्प मात्रात्मक परिवर्तन ही सम्भव हो पाया।

भारतीय समाज के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद से आज़ादी के बाद तेजी से बढ़नी थी, वह नहीं बढ़ी। शासक वर्गों ने सामंतवाद और भूस्वामी वर्ग से गठजोड़ किया। भारतीय पूंजीवाद तब अस्तित्व में आया जबकि पूंजीवाद, वैश्विक स्तर पर अपनी पतनशील साम्राज्यवादी अवस्था में प्रवेश कर गया। दुनिया को वह दो बार व्यापक और लम्बे विश्वयुद्धों की तबाही दे चुका। वह फासीवाद का तोहफा लिए अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े दौड़ाने लगा। उसकी अपनी प्रगतिशील भूमिका समाप्त हो गई और वह पतनशील भूमिकाओं के साथ पूरी तीव्रता के साथ सक्रिय हो गया। चूंकि दुनिया में उसका समाजवादी विकल्प विचारधारात्मक स्तर पर ही नहीं जमीनी स्तर पर भी जड़ें जमाकर सारी दुनिया के जन-गणों के बीच लोकप्रियता अर्जित करने लगा, इसलिए अपनी मृत्यु को प्रत्यक्ष देखकर वह बर्बरता की तरफ बढ़ने लगा।

भारतीय पूंजीवादी शासक वर्ग भी अपनी सत्ता के छिनने और मेहनतकश जनता के सच्चे जनतंत्र की स्थापना के भय से अपनी प्रगतिशील भूमिका को छोड़कर सामंतों, राजे-रजवाड़ों और प्रतिक्रियावादी शक्तियों के साथ खड़ा हो गया। राजा-महाराजाओं और प्रतिक्रियावादी शक्तियों के पुरातनपंथी विचारों, धार्मिक अंधविश्वासों और ग्राम्य जीवन के स्तर पर सामंती व्यवस्था को बनाए रखने के लिए जातिवादी चेतना को पुष्ट किया। जाति और धर्म की सामंती सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं को बल प्रदान किया। किसानों और मजदूरों का दमन किया। हैदराबाद निजाम के पक्ष में तेलंगाना के किसान आंदोलन को कुचलना, केरल की जनतांत्रिक ढंग से निर्वाचित साम्यवादी सरकार को भंग करना, देश भर में जगह-जगह मजदूर आंदोलनों पर पुलिस की गोलियां चलना, इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

पूंजीवादी विकास ने श्रमजीवी जन-गण की झोली में कोई उल्लेखनीय लाभ नहीं डाले। दलितों पर अत्याचार और वर्ण-भेद का व्यवहार, महिलाओं पर अत्याचार और लिंग-भेद का व्यवहार, आदिवासियों का विस्थापन और उनका उत्पीड़न निरंतर जारी ही नहीं रहा, बढ़ता गया। औद्योगिक आवश्यकताओं के लिए जो शिक्षा व्यवस्था खड़ी की गई उसने एक मध्य वर्ग जरूर बनाया। आरक्षण ने दलितों के बीच भी एक मध्य वर्ग बनाया और कुछ आदिवासी जन भी शिक्षा और आधुनिक ज्ञान के नजदीक आए। यह मध्य वर्ग भी भारतीय समाज को आधुनिक सांस्कृतिक वातावरण निर्मित करने के बजाय खुद भी सामंती संस्कृति को ही जीता रहा। पूंजीवादी-सामंती राजसत्ता में हिस्सेदारी और अपना अभिजनीकरण ही उनका लक्ष्य बनकर रह गया। जबकि इस मध्यवर्ग की ऐतिहासिक जिम्मेदारी बहुत बड़ी है, उन्हें श्रमजीवी जन-जन के इन अस्सी प्रतिशत लोगों को पूंजीवाद-सामंतवाद से मुक्ति के क्रांतिकारी पथ पर आगे बढ़ाना था।

विभिन्न भारतीय जातीयताएं, केन्द्रीय शासक वर्ग के अविश्सनीय, पक्षपातपूर्ण, चालबाज और गैर जनतांत्रिक, व्यवहार के कारण अपनी जातीय स्वायत्तता और विकास तथा सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए सन्नद्ध होने लगीं। हिन्दु तत्ववादियों ने हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान जैसे नारों के साथ हिन्दी जाति के प्रभुताशील व्यवहार का डर फैलाया। फलस्वरूप राज-काज और अन्तरप्रान्तीय सम्पर्क की भाषा के रूप में अंग्रेजी न केवल जारी रही बल्कि दक्षिण भारतीय जातीयताओं ने उसे ही बनाए रखने का दबाव भी जारी रखा। यह स्थिति भारत में वर्तमान साम्राज्यवादी सांस्कृतिक आक्रमण के लिए काफी सहायक सिद्ध हुई। बल्कि उसने अंग्रेजीदां प्रभुत्वशाली लोगों के माध्यम से अपनी राह को बेहद आसान बना लिया।

भाषा सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं होती वह संस्कृति का माध्यम भी होती है। पश्चिमी संस्कृति के पतनशील तत्व और व्यवहार, उसके माध्यम से भारतीय संस्कृति पर सहज ही आरूढ़ होते रहे। पश्चिमी साम्राज्यवादी शासकों को भारतीय शासक वर्ग को अपनी पतनशील संस्कृति में ढालने का काम आसान हो गया। भारत में एक ऐसा अंग्रेजी भाषी समाज अस्तित्वमान हो गया जिसके हाथ में राज्यसत्ता के तमाम सूत्र हैं और जो पश्चिमी संस्कृति के अंधानुकरण में लिप्त है। यह तबका भारत में साम्राज्यवादी संस्कृति का वाहक बना हुआ है। उसे पश्चिम की घटिया, निकृष्ट और सड़ांधयुक्त चीजें भी उच्च कोटि की नजर आती हैं और भारतीय संस्कृति का श्रेष्ठ भी हीन और त्याज्य नजर आता है।

हमें इस वास्तविकता को भी समझना चाहिए कि जनपदीय संस्कृतियां जब एक-जातीय संस्कृति में समाहित होने की प्रक्रिया से गुजर रही होती है तो उनमें से एक संस्कृति प्रमुख रूप धारण कर लेती है और अन्य संस्कृतियां उसमें समाहित होने लगती हैं। हिन्दी जातीयता के निर्माण की प्रक्रिया पूरी नहीं होने के पीछे विभिन्न जनपदों की संस्कृति की अपनी समृद्ध अवस्था और किसी दूसरी संस्कृति के वर्चस्व के प्रति उनकी सजग सक्रियता भी एक मुख्य कारण रही दिखाई देती है। अन्य सांस्कृतिक तत्व तो उनके मध्य परस्पर अपनाये जाते दिखते हैं, लेकिन भाषा के स्तर पर वे हिन्दी के वर्चस्ववाद और अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक इकाई की पहचान के प्रति काफी सजग और चिन्तित दिखाई देते हैं। विभिन्न जनपदीय भाषायें संविधान की आठवीं सूची में शामिल होना चाहती हैं। अतः आंचलिक बोलियों और जनपदीय भाषाओं के संरक्षण की आश्वस्ति आवश्यक हो गई है।

हिन्दी जातीयता एक बहुजनपदीय संघबद्ध जातीयता के रूप में विकसित हुई है और उसका यही स्वरूप स्वाभाविक प्रतीत होता है। सामंती साम्राज्यवादी समय में उसके तमिल, मराठी, बंगाली, मलयाली, तेलगू जातियताओं की तरह एकमेक जातियता का रूप ग्रण करने के अवसर ज्यादा थे। अब उनके बीच संघबद्धता ही जनतांत्रिक व्यवहार के अनुकूल है।

दूसरी तरफ वैश्वीकरण की स्थितियां रोजगार के लिए अंग्रेजी भाषा को अनिवार्य बनाती जा रही है। इसलिए सभी जनपदों और जातीयताओं में ठेठ ‘प्रेप लेवल’ से ही अंग्रेजी माध्यम के स्कूल शिक्षा का मुख्य आधार बनते जा रहे हैं। अंग्रेजी भाषा में व्यवहार हेतु भी अनेक प्रकार के कोचिंग इंस्टीट्यूट और इंगलिश स्पीकिंग कोर्स चल रहे हैं। हिन्दी जातीयता के जनपद और दूसरी जातीयतायें हिन्दी के मुकाबिल अपनी स्वतंत्र पहचान के प्रति तो भारी सजगता दिखाते दिखते हैं, लेकिन अंग्रेजी के वर्चस्व को उत्साहपूर्वक स्वीकार किया जा रहा है। इस स्थिति में हिन्दी का वर्चस्ववादी व्यवहार, अंग्रेजी के साम्राज्यवादी वर्चस्ववाद को स्वीकार बनाने में परोक्ष सहायक दिखाई देता है।

( अगली बार – लगातार – तीसरा भाग )
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आलेख – शिवराम

रविवार, 11 सितंबर 2011

जनसंस्कृतियाँ और साम्राज्यवादी संस्कृति – पहला भाग

जनसंस्कृतियाँ और साम्राज्यवादी संस्कृति – पहला भाग
शिवराम

( शिवराम का भारतीय समाज के संदर्भों में जनसंस्कृतियों की विकास-अवस्थाओं और साम्राज्यवादी अपसंस्कृतिकरण पर लिखा गया यह महत्त्वपूर्ण आलेख इसकी लंबाई को देखते हुए यहां चार भागों में प्रस्तुत किया जा रहा है. प्रस्तुत है पहला भाग. )


प्राचीन जन-समाज, जिनके अपने-अपने जनपद भी हुआ करते थे परस्पर युद्धरत भी होते थे और संघबद्ध भी होते थे। युद्ध भी और संघबद्धता भी दो या अधिक जनपदों के मध्य सांस्कृतिक अन्तःक्रिया की स्थिति उत्पन्न करते थे। लेकिन दोनों स्थितियों में मूलभूत अंतर होता था। युद्धजनित स्थिति में ‘विजेता’ जन समाज की, ‘पराजित’ जन समाज के युद्धबन्दियों के साथ अन्तःक्रिया होती थी। विजेता जन समाज द्वारा युद्धबंदी अपने में मिला तो लिए जाते थे, लेकिन विजेता जन समाज यहां प्रभुतापूर्ण प्रभावशाली स्थिति में होता था और पराजित युद्धबंदी लघुतापूर्ण उपकृत स्थिति में होते थे।

ये ‘जन समाज’ आदिम साम्यवादी समाज थे जिनमें किसी भी प्रकार के भेदभाव अभी उत्पन्न नहीं हुए थे। दूसरे जनपद के युद्धबन्दी थोड़े ही समय में घुलमिल जाते थे। इनके बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी होता था। युद्धबंदियों के पास अपने जनपद से लाया हुआ जो महत्वपूर्ण ज्ञान, कौशल और मूल्यगत-व्यवहारगत बातें होती थीं, उन्हें विजेता जनपद के लोगों द्वारा सहज रूप में ग्रहण कर लिया जाता था। पराजित युद्धबंदियों को तो विजेता जनपद की संस्कृति में ढलना ही होता था। जबकि जनपदों की संघबद्धता की स्थिति में संघबद्ध हुए जनपद लगभग समान स्तर पर होते थे और उनके बीच होने वाली अंतःक्रिया हर प्रकार के दबाव से मुक्त होती थी। दबाव मुक्त अवस्था में होने वाले इस मेल-जोल में उनकी संस्कृतियों का श्रेष्ठ ही पुष्पित-पल्लवित होता था और निकृष्ट या क्षीण और हीन मुरझाता जाता था। दोनों संस्कृतियां मिल कर एक नयी समृद्ध संस्कृति का निर्माण करती थीं। जब कई जनपद संघबद्ध होते थे तो बड़े और अधिक समृद्ध जनपद की नेतृत्वकारी स्थिति होती थी।

यह जनसंस्कृतियों का प्रारम्भिक पारस्परिक व्यवहार था, जो जनतांत्रिक प्रकार का भी था और साम्राज्यवादी प्रकार का भी। लेकिन साम्राज्यवादी प्रकार भी बाद के साम्राज्यवादी व्यवहारों जैसा वर्चस्ववादी नहीं था।

फ़्रेडरिक एंगेल्स इस विषय में अमरीका की आदिवासी जातियों के बारे में लिखते हुए बताते हैं कि - ‘‘जनसंख्या का घनत्व बढ़ने से यह आवश्यकता उत्पन्न हुई कि आंतरिक रूप से और बाहरी दुनिया के विरूद्ध संघबद्ध हुआ जाय। हर जगह सम्बन्धित जातियों का संघ आवश्यक हुआ और शीघ्र ही उनका परस्पर घुल-मिलकर एक होना भी आवश्यक हो गया। तब कबीलों के विभिन्न प्रदेश ‘जनपद’, जनता के एक ही विशाल प्रदेश ‘महाजनपद’ में घुलमिल कर एक हो गए।’’ साथ ही एंगेल्स यह भी बताते हैं कि - ‘‘प्राचीन जनों का एकीकरण समानता और भाईचारे के आधार पर सदा जनतांत्रिक ढंग से नहीं होता। शक्तिशाली जन दूसरों पर विजय प्राप्त करके भी यह एकीकरण की प्रक्रिया पूरी करते थे।’’

दरअसल, प्राचीन ‘जन-समाज’ कोई स्थिर जन समाज नहीं होते थे। प्राचीन कबीलाई ‘जन’ जो रक्तसम्बन्धों पर आधारित  थे, वे रक्त सम्बन्धों पर आधारित होते हुए भी क्रमशः शुद्ध रक्त वाले नहीं रह गये थे। अजनबियों और युद्धबंदियों को सम्मिलित करने और दूसरे ‘जन-समाजों’ के साथ संघबद्ध होते रहने की प्रक्रिया में वे मिश्रित नस्लों वाले होते गये। इस दौरान दस्तकारी और कृषि के विकास के साथ-साथ व्यक्तिगत स्वामित्व और व्यक्तिगत सम्पत्ति का आविर्भाव भी होने लगा। कार्य विभाजन आवश्यक हो गया और वर्णव्यवस्था अस्तित्व में आई। आदिम साम्यवादी ‘जन-समाज’ सामंती समाज में बदलने लगे। जन समाजों का विघटन होने लगा और महाजनपदों का गठन हुआ।

यद्यपि प्राचीन जन समाजों का यह विघटन सर्वत्र न तो एक साथ हुआ और न ही पूर्णरूपेण हुआ। नए सामंती जन-पद, प्राचीन जन-समाजों के अनेक अवशेषों के साथ अस्तित्वमान हुए। बल्कि भारत की भौगोलिक राजनैतिक स्थितियों ने विकास के विभिन्न स्तरों के जन-समाजों को भी सामान्य विकासशील उथल-पुथल से दूर रहकर अस्तित्वमान रहने की सुविधा भी प्रदान की। इन नये जनपदों के निर्माण की प्रक्रिया को देखें तो पाते हैं कि वहां भी समर्थ-शक्तिशाली ‘जन’ और दूसरे ‘जनों’ के बीच साम्राज्यवादी व्यवहार भी था। यह सामंती साम्राज्यवादी व्यवहार था। यह प्रक्रिया उत्तर भारत में चंद्रगुप्त मौर्य से लेकर समुद्रगुप्त तक के साम्राज्यों के स्थापना काल में पूरी हो गई थी। डॉ. के.पी. जायसवाल ( हिन्दु पोलिटी, बंगलोर, 1943 ) के अनुसार ‘मौर्य साम्राज्यवाद’ और ‘हिन्दू यूनानी क्षत्रपों’ ने अधिकांश प्राचीन गणराज्यों यानी ‘जन-समाजों’ का विनाश किया।

यहां दो बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। एक तो यह कि जब सामंती साम्राज्यवाद ने अपने समय में प्राचीन ‘जन-समाजों’ को नए सामंती साम्राज्य में एकीकृत किया तो सामंती साम्राज्यवादी संस्कृति ने प्राचीन जनपदों की संस्कृति के साथ कैसा व्यवहार किया और साथ ही यह भी देखना चाहिए कि पूंजीवादी साम्राज्यवाद आज विभिन्न राष्ट्रीय राज्यों की जातीय और जनपदीय संस्कृतियों से कैसा व्यवहार कर रहा है। इन दोनों साम्राज्यवादी व्यवहारों में क्या भेद हैं? ये भेद मात्रात्मक ही हैं या गुणात्मक भी। दूसरे यह कि जैसे प्राचीन गण समाजों के विघटन और महाजनपदों तथा लघुजातियों के निर्माण की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई और सामंती साम्राज्यों के समय में भी ‘जन’ समाजों के न केवल अनेक अवशेष अस्तित्वमान रहे बल्कि अनेक जन जातियां भी अस्तित्वमान रहीं, वैसे ही आधुनिक समय में महाजनपदों और लघु जातीयताओं के एकीकरण और राष्ट्रीय जातीयताओं के निर्माण की प्रक्रिया भी यहां पूरी नहीं हुई। अनेक लघु जातीयताएं, जनपद और जन-जातियां अपने विशिष्ट स्वरूप को आज भी बनाए रखे हुए हैं।

हम आज भी अनेक अंचलों को जन-पद कहते हैं। यद्यपि अपनी जनपदीय अवस्था की अनेक विशिष्टताओं से युक्त होते हुए भी इन जनपदों ने महाजनपदों, लघु जातियों और जातीय तथा राष्ट्रीय बहुजातीय पुनर्गठनों की लम्बी राजनैतिक-सामाजिक और सांस्कृतिक यात्रा की है। ब्रज, बुंदेलखण्ड, मिथला, भोजपुर आदि ऐसे ही अंचल है। छत्तीसगढ़, झारखण्ड और राजस्थान एवं  अन्य प्रदेशों में भी अनेक जनजातियां प्राचीन सांस्कृतिक-सामाजिक मूल्यों के साथ अब भी अस्तित्वमान है। इसी प्रकार विभिन्न राष्ट्रीय जातीयताएं संघबद्ध तो हुई हैं लेकिन एक आधुनिक बहुराष्ट्रीय जातीयता के रूप में घुल मिल जाने की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है।

भारत में हिन्दी जातीय एकीकरण का काम अभी तक पूरा नहीं हुआ है। बल्कि उल्टी प्रक्रिया भी दिखाई देने लगती है। जनपदीय-आंचलिक भाषा-बोलियों की मान्यता और अलग राज्य के रूप में राजनैतिक इकाई के रूप में गठन की मांग के लिए जो आंदोलन दिखाई पड़ते हैं वे इस बात के द्योतक हैं कि जनपदों के जातीय सांस्कृतिक विकास में उल्लेखनीय अधूरापन रह गया है। वे रच-पच कर एकमेक नहीं हो पाए। साथ ही इस बात के द्योतक भी हैं कि आंचलिक और उपजातीय संस्कृतियां देश के भीतर से भी साम्राज्यवादी किस्म के राजनैतिक भेदभाव और सांस्कृतिक उपेक्षा महसूस कर रही हैं। वे इस बात के भी द्योतक हैं कि अब पूंजीवाद आधुनिक जातीयताओं के निर्माण की जनतांत्रिक प्रक्रिया को बल प्रदान करने के बजाय उनके विखण्डन की अवसरवादी राजनीति को प्रश्रय दे रहा है।

इन जनपदों में स्वतंत्र पहचान की प्रवृत्ति क्यों रही? क्या यह सच नहीं है कि उनकी अपनी भाषा साहित्य और संस्कृति एक समृद्ध जातीय इकाई के रूप में विकसित हुई, और जनपदीय सांस्कृतिक इकाई के बजाय वे जातीय इकाई की तरह व्यवहार करती रहीं?

भारतीय बहुराष्ट्रीय राज्य की संरचना की विशिष्टताओं को भली-भांति समझा जाना चाहिए। तमिल जातीयता का गठन 1310 ई. से पहले ही हो गया था। 1669 में शिवाजी ने मराठा राज्य स्थापित किया। कार्ल माक्र्स ने ‘नोट्स आन इण्डियन हिस्ट्री’ में कहा ‘‘इस प्रकार मराठे एक जाति बने जिन पर स्वतंत्र राजा राज्य करता था।’’ दक्षिण की अन्य जातीयताओं और बंगाली जातीयताओं के गठन की प्रक्रिया भी काफी पहले पूरी हो गई लेकिन कुछ अन्य एवं हिन्दी भाषा-भाषी प्रदेशों के बीच जातीयता के निर्माण की प्रक्रिया अभी भी अधूरी है। जबकि सामंती साम्राज्यवाद के काल में ही लघु जातीयताओं के सम्मिलन और बड़े प्रदेशों के गठन की प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए थी। जबकि उत्तर भारत की लघु जातीयताओं वाले जनपदों में ऐसी अनेक आधारभूत समानताएं हैं कि उनका महाप्रदेश के रूप में संगठित होना स्वाभाविक था। मुगल शासन के अंतर्गत यह प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। लगभग पूरा उत्तर भारत एक हुकूमत के अधीन रहा।  वैसे तुर्कों के समय में भी उत्तर भारत काफी केन्द्रबद्ध हो गया था। यह इतिहास की जरूरत थी। एक केन्द्रीकृत राज्यसत्ता इस क्षेत्र के विकास की अनिवार्यता थी। डॉ. रामविलास शर्मा ‘‘भाषा और समाज’’ में उल्लेख करते हैं कि - ‘‘राजपूत सामंतों की यह बुनियादी कमजोरी थी कि वे न तो राजस्थान को एक सुकेन्द्रित शासन व्यवस्था में ला सके न समूचे उत्तर भारत ( या हिन्दी भाषी प्रदेश ) का एक राज्य कायम कर सके। राजस्थान या हिन्दी भाषी प्रदेश में वे एक संयुक्त जातीय राज्य कायम नहीं कर सके।’’

जबकि यह उनका ऐतिहासिक दायित्व था। इस दायित्व को विदेशी हमलावर राजनैतिक शक्तियों ने पूरा किया। संभवतः इस अनिवार्यता के लिए बनी रिक्तता ने ही उन्हें यह अवसर दिया। ‘‘जागीरदारों और सामंतों के स्वतंत्र राज्यों का अलगाव खत्म किये बिना व्यापार की उन्नति और उसका प्रचार सम्भव नहीं था।’’ ( डॉ. रामविलास शर्मा ) महाजनी पूंजीवाद की विकासशीलता के लिए सुकेन्द्रित राज्य व्यवस्था आवश्यक थी।

फिर यह सवाल उठता है कि बावजूद मुगलों के नेतृत्व में संकेन्द्रित राज्य व्यवस्था के हिन्दी महाजातीयता का गठन पूर्णता को क्यों नहीं प्राप्त कर सका? ब्रिटिश साम्राज्य के आविर्भाव और मुगल सत्ता के कमजोर होते ही वह लघुजातीयताओं वाले पुराने सामंती राज्यों में क्यों बंट गया? 1857 में अगर ये राज्य एकजुट होकर एक सुगठित जातीयता के रूप में अंग्रेजी ताकत से लड़े होते तो यह निश्चित लगता है कि 1857 के बाद के भारत का इतिहास कुछ और ही रूप में हमारे सामने आता।

दक्षिण भारतीय जातीयताएं स्वतंत्र राष्ट्र राज्यों के रूप में रहने को प्रवृत्त रहती दिखाई देती थीं। वर्ण व्यवस्था के लम्बे, निर्मम और बर्बर व्यवहार ने दलित जातियों में सम्पूर्ण समाज के प्रति भेदभाव और अत्याचार जन्य अलगाव का बोध था। सामंती राजाओं और नवाबों की पतनोन्मुख प्रवृत्तियों ने ब्रिटिश साम्राज्य को स्थापित होने के लिए अनुकूल स्थितियां बनाईं। जातीय संस्कृतियां शक्तिशाली राजनैतिक इकाई के रूप में अस्तित्वमान नहीं रह पाती तो दूसरी शक्तिशाली जातीयतायें आक्रामक साम्राज्यवादी व्यवहार करने का अवसर पा जाती हैं।
( अगली बार – लगातार – दूसरा भाग )
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आलेख – शिवराम